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माँ-बाप के बाद बदलता मायका और रक्षाबंधन का सच्चा अर्थ,एक नया दृष्टिकोण | KhabarForYou

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Name:-MADHU SHARMA
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Instagram:-@thehealingspace.by.madhu


इस रक्षाबंधन पर, जहाँ लाखों बहनें अपने बचपन के आँगनों की ओर लौट रही हैं, वहीं देश भर में एक गहरा और अनकहा बदलाव भी सांस ले रहा है। उन भाई-बहनों के लिए जिनके सिर से माँ-बाप का साया उठ चुका है, यह रेशमी धागा केवल एक पर्व का औपचारिकता नहीं - यह उनकी पहचान, अस्तित्व और जिंदगी भर के अनकहे वादों का आखिरी सहारा बन जाता है।

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42, सिविल लाइंस का वह पुराना लकड़ी का दरवाजा अब पहले की तरह चरमराता नहीं है। उसे खोला जाता है तो उसमें एक अजीब सी शांति और अजनबीयत की आहट होती है।

जब सुनीता (34) आज सुबह अपने हाथों में पीतल की थाली, ताजे गेंदे के फूल और कलावा लेकर अपने मायके की दहलीज पर रुकीं, तो उन्हें अंदर से माँ की जानी-पहचानी आवाज सुनाई नहीं दी - वह आवाज जो त्योहार के दिन सुबह-सुबह खीर में मेवे डालने का हुक्म दिया करती थी। बाबूजी की बरामदे में भारी कदमों की चाप भी दो साल पहले की सर्दियों के साथ हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थी।

यह भारत भर के उन हजारों वयस्क बेटियों की एक अनदेखी सच्चाई है, जो रक्षाबंधन पर उस 'मायके' लौटती हैं जिसकी नींव ही गायब हो चुकी है।

सांस्कृतिक रूप से रक्षाबंधन को चमकदार रोशनियों, मिठाइयों और उपहारों के लेन-देन के रूप में दिखाया जाता है। लेकिन इस दिखावे के पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सच छुपा है: एक बहन उस घर में कैसे कदम रखती है जहाँ उसे बनाने वाले अब नहीं हैं? और कैसे एक मामूली सा रेशमी धागा सिर्फ एक परंपरा न रहकर जीवन भर का सबसे बड़ा धर्म और वचन बन जाता है?


पहला अध्याय: खाली आँगन का सन्नाटा - एक छूटे हुए ठिकाने की ओर कदम

भारतीय समाज में विवाह के बाद भी बेटी के लिए उसका मायका एक स्थायी मानसिक सुरक्षित ठिकाना होता है। यह वह जगह होती है जहाँ वह किसी की पत्नी, बहु या माँ बनकर नहीं, बल्कि सिर्फ एक बेफिक्र बच्ची बनकर लौटती है।

लेकिन जब माता-पिता दोनों नहीं रहते, तो उस घर का ढांचा हमेशा के लिए बदल जाता है। रक्षाबंधन पर पहुँचने वाली बहन अब किसी अधिकार के साथ कदम नहीं रखती; वह अपने भाई और उसके परिवार के सौजन्य से बने एक नए माहौल में प्रवेश करती है।

"माता-पिता के जाने के बाद जब आप पहली बार अपने बचपन के घर में घुसते हैं, तो आपके कदम दरवाजे पर ही ठिठक जाते हैं," "अब आप माँ-बाप के पास नहीं आ रहे, आप अपने भाई के घर मेहमान बनकर आ रहे हैं। दीवारें वही हैं, खिड़कियों की जंग वही है, लेकिन हवा का मालिकाना हक बदल चुका होता है।"

मनोवैज्ञानिक इसे द्वितीयक विस्थापन (Secondary Displacement) कहते हैं। यह दुख सिर्फ माता-पिता को खोने का नहीं है; यह उस तटस्थ जमीन को खोने का दर्द है जहाँ भाई और बहन एक ही छत के नीचे बिल्कुल बराबर हुआ करते थे।

श्रावण पूर्णिमा की सुबह जब एक बहन जल्दी पहुँचती है, तो हर रस्म यादों के बोझ से भारी हो जाती है:

रसोई का बदलता नियम: जिस रसोई पर कभी माँ का अनकहा राज हुआ करता था, वहाँ अब भाभी के अपने नियम और ताल होती है। बहन उस रसोई में मेहमान बन जाती है जहाँ उसने कभी अपनी पहली गोल रोटी बनाना सीखा था।

एक अनकही झिझक: अब यह तय करना आसान नहीं होता कि कितने दिन रुकना है। माता-पिता के बिना, बहन को हर पल यह सोचना पड़ता है कि उसकी मौजूदगी से भाई के रोज़मर्रा के जीवन में कोई खलल तो नहीं पढ़ रहा।

बचपन के सामान की गुमशुदगी: जिन दराजों में कभी उसकी पुरानी स्कूल की कॉपियाँ या रिबन रखे होते थे, वे अब बदल दिए गए हैं। वर्तमान की जगह बनाने के लिए अतीत के निशानों को समेट दिया गया है।

फिर भी, हर साल बहनें यह सफर तय करती हैं। क्यों? क्योंकि यह त्योहार अब केवल बचपन के जश्न का नाम नहीं रहा; यह यादों और रिश्तों को जिंदा रखने की एक बेहद साहसी कोशिश बन चुका है।


दूसरा अध्याय: रेशम के धागे से परे - खामोश वचनों की एक अनदेखी दीवार

समाज ने रक्षाबंधन को एक बहुत मामूली परिभाषा में समेट दिया है: बहन धागा बाँधेगी और भाई उसकी शारीरिक सुरक्षा का वचन देगा।

लेकिन गहराई से देखें तो यह रिश्ता कभी केवल शारीरिक सुरक्षा का सौदा था ही नहीं। जब माँ-बाप नहीं रहते, तब यह राखी एक साधारण धागे से बदलकर एक ऐसा वचन बन जाती है जो किसी कानून या कानूनी कागज से बहुत बड़ा होता है।


1. वजूद को याद रखने का वचन

आधुनिक दौर में भाई अपनी बहन को किसी शारीरिक खतरे से ज्यादा इस बात से बचाता है कि वह दुनिया में खुद को अकेला या बेघर न समझे। माता-पिता के जाने के बाद महिला के अपने पुराने अस्तित्व की डोर टूटने लगती है। भाई ही इस दुनिया में अकेला ऐसा इंसान बचता है जो उसे उसके बचपन से जानता है - जो जानता है कि वह जिम्मेदारियों के बोझ तले दबने से पहले असल में कौन थी।

कलाई पर बंधा यह धागा एक अनकहा वादा है: "चाहे हमारा बचपन का घर रहे या न रहे, मैं हमेशा याद रखूँगा कि तुम कहाँ से आई हो।"


2. बेझिझक अपनेपन का वचन

पारंपरिक और मध्यमवर्गीय परिवारों में एक शादीशुदा औरत का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच उसका मायका होता है। अगर ससुराल में कोई संकट आए, तो कानूनी अधिकार मिलने में सालों लग जाते हैं। कलाई पर बंधी राखी इस बात का अनकहा भरोसा है कि संपत्ति के बँटवारे या पारिवारिक दूरियों के बावजूद, उसके लिए एक दरवाजा हमेशा बिना किसी शर्त के खुला रहेगा।


3. सुरक्षा का उल्टा प्रवाह

इतिहास और पौराणिक कथाएँ गवाह हैं कि रक्षा का यह वचन एकतरफा नहीं होता। जब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान श्रीकृष्ण की बहती उंगली पर बाँधा था, तो वह कोई रक्षा माँग नहीं रही थीं; वह रक्षा और सहानभूति दे रही थीं।

जिन घरों में माता-पिता नहीं रहते, वहाँ अक्सर बहनें ही अपने भाइयों के लिए सबसे बड़ा मानसिक सहारा बनती हैं। वे ही उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े रखती हैं, सही सलाह देती हैं और बिखरते परिवार को एक धागे में पिरोकर रखती हैं।


तीसरा अध्याय: जो न कभी अखबारों में छपा, न किताबों में लिखा गया

दशकों से रक्षाबंधन पर मीडिया की खबरें सिर्फ बाजार के रुझानों, महँगी राखियों या सेलिब्रिटी के जश्न तक सीमित रही हैं। जो बात कभी छप नहीं पाई, वह है माता-पिता के जाने के बाद भाइयों और बहनों द्वारा इस रिश्ते को सींचने की खामोश मेहनत।

आज जब एक बहन अपने माता-पिता के बिना उस खाली पड़े घर में भाई को राखी बाँधती है, तो वह तीन ऐसे बुनियादी काम कर रही होती है जिन्हें दुनिया की कोई अदालत या कानून दर्ज नहीं कर सकता:


शाम ढलते ही सुनीता अपने ससुराल वापस जाने की तैयारी करती हैं। उनके भाई की कलाई पर बंधा धागा अब भी चमक रहा है। माँ की वह पुरानी पीतल की थाली वापस उनके बैग में आ चुकी है।

सुनीता को आज 42, सिविल लाइंस में उनके माता-पिता नहीं मिले। लेकिन उस धागे को बाँधते वक्त, एक-दूसरे का हाथ कसकर थामते वक्त और खाली पड़े आँगन को एक साथ देखते वक्त, उन्हें एक ऐसी अटूट उम्मीद मिली जो उस घर के न रहने के बाद भी हमेशा जिंदा रहेगी।

रक्षाबंधन केवल रीति-रिवाज या सहूलियत का धागा नहीं है। यह इंसानियत का सबसे खूबसूरत वादा है - एक ऐसा वचन जो यह साबित करता है कि भले ही नींव का मकान ढह जाए, लेकिन रिश्तों की बुनियाद कभी खत्म नहीं होती।

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एक नया दृष्टिकोण - समय के साथ बदलती रिश्तों की परिभाषा
@TheHealingSpace.By.Madhu


उपरोक्त पड़ताल और खालीपन के अहसास के बीच, जब हम जीवन और समय के चक्र को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं, तो एक नया परिप्रेक्ष्य सामने आता है:

परिवर्तन सृष्टि का नियम है। जो आया है, उसे एक दिन जाना है। फिर जब माता-पिता चले जाते हैं, तो एक सवाल मन में आता है - जिस घर को हमने हमेशा माँ-पापा का घर कहा, वह अचानक भाई का घर कैसे हो गया?

हाँ, बेटी के लिए माता-पिता की कमी हमेशा रहेगी। त्योहार आते-जाते रहेंगे, लेकिन वह कमी किसी एक त्योहार की नहीं, जीवन भर की है। फिर क्या हर बार उसी खालीपन को महसूस करना ही उस रिश्ते की सच्चाई है?

रसोई के नियम बदल गए तो क्या जरूरी है कि किसी ने किसी की जगह छीन ली? माँ ने भी तो कभी अपनी सास के घर की परंपराओं के साथ अपना घर बनाया होगा। अगर मेरी खुशी मायने रखती है, तो मेरी भतीजी की खुशी क्यों नहीं? अगर मेरे पिता मुझे बहुत प्यार करते थे, तो मेरे भाई का अपनी बेटी को मुझसे ज्यादा प्यार करना गलत क्यों हो?

और जिस बहन को उस घर की कमी महसूस होती है, भाई तो उसी घर में रहकर रोज अपने माता-पिता की कमी महसूस करता होगा। भाभी भी कभी किसी की बेटी थी; आज वह उस घर को अपना बनाने की कोशिश कर रही है।


शायद मायका खत्म नहीं होता, उसका रूप बदलता है।

अगर हम अपने माता-पिता की सबसे खूबसूरत विरासत उनके खुशहाल परिवार को मान लें, तो शायद दुख खत्म न हो, पर उसका अर्थ बदल सकता है।

जिस प्यार की कमी हमें महसूस होती है, उसे अपने बच्चों, भाई और परिवार में बाँटते जाना शायद उसी प्रेम को आगे बढ़ाना है।

शायद समय हर ज़ख्म को भरता नहीं, बस हमें उन्हीं ज़ख्मों के साथ नई खुशियाँ तलाशना सिखा देता है।


रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं 

मायके का रूप चाहे बदले, भाई-बहन के स्नेह, आत्मीयता और अनकहे वादों का यह धागा हमेशा अमर रहता है। 

आप सभी को रक्षाबंधन के पावन पर्व की सहृदय और हार्दिक शुभकामनाएं!

Team KhabarForYou.com एवं @TheHealingSpace.By.Madhu

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